Wednesday, August 19, 2015

और ओम प्रकाश ने मधु के घर पालथी मार दी।

-वीर विनोद छाबड़ा 
एक थे कॉमेडियन ओम प्रकाश। ग़ज़ब की टाईमिंग। बिंदास और नेचुरल एक्टिंग। बहुत कम हुए हैं ऐसे आर्टिस्ट जिनकी मौजूदगी से सेट को ज़िंदगी मिलती। हलचल रहती। कहकहे गूंजते थे। उन्होंने ३०७ फिल्मों में काम किया।
उनकी अदाकारी और उनकी ज़िंदगी से जुड़े तमाम किस्से किसी और दिन। आज सिर्फ़ यह बताना है कि ओम प्रकाश का सरनेम बक्शी था और उन्होंने साथ फ़िल्में फ़िल्में प्रोड्यूस की थीं - कन्हैया (नूतन-राजकपूर), संजोग (प्रदीप कुमार-अनीता गुहा) और जहांआरा (भारत भूषण-माला सिन्हा)।

चाचा ज़िंदाबाद (किशोर कुमार-अनीता गुहा) और गेट वे ऑफ़ इंडिया (मधुबाला-भारत भूषण-प्रदीप कुमार) ओम प्रकाश ने न सिर्फ़ प्रोड्यूस की बल्कि लिखी और डायरेक्ट भी कीं। 'गेट वे ऑफ़ इंडिया' एक रात की कहानी है। नायिका घर से भागी हुई है। पर्स में लाखों के ज़ेवरात हैं। तमाम शातिर लुटेरे और सफ़ेदपोश लूटने के लिये तैयार हैं। जैसे-तैसे वो इनसे जान बचाती हुई सही जगह पहुंचती है।
जिस वक़्त कहानी का आईडिया ओम प्रकाश में दिमाग में आया, उसी वक़्त उन्होंने तय कर लिया कि हीरोईन मधुबाला ही होगी। अब मधुबाला को साईन करना कोई आसान काम तो था नहीं। मधुबाला की ज़िंदगी में सबसे बड़े विलेन उनके अब्बा अताउल्लाह खान से मिलिए। उन्हें तफ़सील बताईये। वही फीस तय करंगे और बाकी की शर्तें भी उन्हीं की होंगी। मधु सेट पर सुबह दस बजे से शाम पांच बजे तक उपलब्ध रहेगी।
लेकिन ओम प्रकाश को तो उनकी ज़रूरत रात के वक़्त रहेगी। अताउल्लाह ने नामुमकिन बोल दिया। ओम प्रकाश ने बहुत चिरौरी की। समझाया कि फ़िल्म के  सारे किरदार हीरोईन के इर्द गिर्द घूमते हैं। मधु के कैरियर की शानदार फ़िल्म साबित होगी। मधु की किसी किस्म की तकलीफ़ नहीं होगी। आराम फ़रमाने के लिए ताज होटल में सबसे उम्दा सुईट बुक करा देने का वादा किया।
लेकिन अताउल्ला टस से मस नहीं हुए।
ओम प्रकाश समझ गए कि सीधी उंगली से घी नहीं निकलेगा। उन्होंने मधु से मिलने की ख्वाईश ज़ाहिर की।
सटाक जवाब मिला कि मधु किसी सूरत में नहीं मिल सकती। आप जल्दी से चाय-नाश्ता करें और दफ़ा हो जायें।
लेकिन ओम प्रकाश परले दरजे के ज़िद्दी। ठान कर आये थे कि मिल कर ही जाऊंगा। चाहे सारी रात इंतज़ार करना पड़े। अगर उनकी नापसंद होगी तो फ़िल्म ही नहीं बनेगी। और ओम प्रकाश पालथी मार पसड़ गए।
अभी पांच मिनट भी नहीं गुज़रे होंगे कि मधु कमरे में दाख़िल हुई।
अताउल्लाह को सांप सूंघ गया।
 
ओम प्रकाश ने मधु को कहानी सुनाई। उनके किरदार बताया।
मधुबाला ने बड़े ध्यान से सब सुना। और अपने अब्बा की तमाम दलीलों और फ़िक्र को ख़ारिज कर दिया। काम के लिए सिर्फ़ हामी ही नहीं भरी अपनी मेहनताने की रक़म भी कम कर दी।
अताउल्लाह को यह सब पसंद नहीं आया। लेकिन कुछ बोले नहीं तो यह सोच कर कि कमाऊ बेटी की बड़ी ज़िद दबाने के लिए छोटी ज़िद मान लेने में कोई बुराई नहीं है। 
हालांकि 'गेट वे ऑफ इंडिया' कोई बड़ी कामयाबी नहीं साबित हुई। ज़ाहिर है सबसे ज्यादा ख़ुशी अताउल्लाह को ही हुई। 
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