- वीर विनोद छाबड़ा
प्रबोध चंद्र दे उर्फ़ मन्ना
के प्रेरणा स्त्रोत उनके चाचा विख्यात संगीतज्ञ-गायक कृष्ण चंद्र डे थे। वो के.सी.डे
के नाम से विख्यात हुए। बताते हैं कि उनको जन्म से ही दिखता नहीं था। उनकी मदद के वास्ते
ही मन्ना कलकत्ता से मुंबई आए थे। और देखते ही देखते वो संगीत और गायन में रम गए। शास़्त्रीय
संगीत में उनकी पकड़ इतनी अच्छी थी कि संगीत महापंडित भीमसेन जोशी भी उनके गायन के मुरीद
हो गए। मन्ना को एकल गाने का पहला ब्रेक १९४३ में मिला। हुआ यों कि ‘राम राज्य’के लिये के.सी.
डे को प्लेबैक का ऑफर मिला। लेकिन उन्होंने मना कर दिया - मैं अपनी आवाज़ किसी अन्य
एक्टर को उधार नहीं दे सकता। गाना ऐसी स्थिति में केसी डे के साथ आये मन्ना से डायरेक्टर
विजय भट्ट और संगीत निर्देशक शंकर राव व्यास ने बात की। तनिक झिझक के बाद वो तैयार
हो गए। ये गीत था- गयी तू गयी, सीता सती...। पहले ही गाने
से हिट हो गए मन्ना डे।
इसके बाद मन्ना ने पीछे
मुड़ कर नहीं देखा। सोलो गानों में तो उनका जवाब ही नहीं था। ऐ मेरे प्यारे वतन...ये
रात भीगी-भीगी...प्यार हुआ इकरार हुआ...रमैया वता वैया....मुस्कुरा लाड़ले मुस्कुरा...ऐ
मेरी ज़ोहरा जबीं...कौन आया मेरे दिल के द्वारे....पूछो ना कैसे मैंने रैन बिताई...लागा
चुनरी में दाग़...किसने चिलमन से मारा…ऐ भाई ज़रा देख के चलो...मस्ती भरा ये समां है...कस्मे वादे, प्यार-वफ़ा सब....ना
मांगू सोना-चांदी....हंसने की चाह न मुझे....तुझे सूरज कहूं या चंदा...फुल गेंदवा ना
मारो...तू प्यार का सागर है....आदि बेशुमार अमर नग़मे मन्ना डे के नाम हैं।
मन्ना सोलो में ही नहीं
युगल गानों के भी उस्ताद रहे। लताजी के साथ सौ से अधिक युगल गाये। मस्ती भरा ये समां
है...नैन मिले चैन कहां...तुम गगन के चंद्रमा हो, मैं धरा की धूल
हूं...दिल की गिरह खोल दो...आदि अनंत गायन की सीमा हैं। आशा के साथ भी मन्ना की जोड़ी
भी खूब बनी। ये हवा, ये नदी का किनारा...तू
छुपी है कहां मैं तड़पता यहां....न तो कारवां की तलाश है....आज भी जु़बान पर हैं।
मोहम्मद रफी के साथ भी
मन्ना ने अनगिनित गीत गाये। बड़े मियां दीवाने ऐसे न बनो...दो दीवाने दिल के...आदि के
दीवाने तो आज भी हैं। मन्ना की किशोर के साथ भी जुगलबंदी खूब जमी। बाबू समझो इशारे, हारन पुकारे....एक
चुतर नार करके श्रंगार...तो आज भी याद हैं। 'पड़ोसन' के ‘एक चतुर नार...’ के बाद मन्ना की
किशोर से अनबन हो गयी थी। दरअसल, किशोर क्लासिकल गाने के
माहिर नहीं थे। बताते हैं, मन्ना ने ही उनको खूब रियाज़
कराया। लेकिन जब अंततः रिकार्ड सामने आया तो मन्ना को लगा कि उन्हें जान-बूझ कर किशोर
के हाथों ज़लील किये जाने का षड्यंत्र रचा गया है। बाद में बामुश्किल मन्ना की ग़लतफ़हमी
दूर की गयी कि वो यह न कोई हार थी और न कोई साज़िश। बल्कि फिल्म में क़िरदार ही ऐसा था
कि उसे हारना था। उन्होंने किशोर के साथ फिर से कई गाने गाये। इसमें यह गाना तो बेहद
पापुलर हुआ - ये दोस्ती हम नहीं छोडेंगे....
संगीत की दुनिया में परदे
के पीछे बड़े तब भी बड़े-बड़े 'खेल' हुआ करते थे। कोशिश
हुई कि उन्हें सिर्फ आगा, अनूप कुमार, महमूद आदि कामेडियन
की आवाज़ तक सीमित रखा जाए। लेकिन उनकी आवाज़ में इतनी कशिश थी कि उसे किसी हद में बांधा
न जा सका। उनके गाये गाने राजकपूर, देवानंद, शम्मीकपूर, बलराज साहनी, राजकुमार, अशोक कुमार, प्राण सरीखे नामी
अभिनेताओं पर फिल्माए गये। और सब खूब मशहूर हुए।
मन्ना किसी एक एक्टर की
आवाज़ नहीं रहे। कहा जाता है कि किसी भी गायक को कॉपी करना आसान है, मगर मन्ना की आवाज़
को जस-का-तस कॉपी करना नामुमकिन रहा। भला आत्मा से निकली आवाज़ की भी कभी कॉपी हुई!
हर इंसान के कैरीयर का
अंत सुनिश्चित है। नए-नए गायक आ गए। सत्तर के दशक का अंत आते-आते मन्ना की मांग घटने
लगी। अस्सी के दशक में उन्हें न के बराबर काम मिला। अंततः उन्होंने फिल्म इंडस्टी को
अलविदा कह दी। अब तक वो स्टेज आर्टिस्ट बन चुके थे। लेकिन यहां भी वो बहुत डिमांड में
रहे।
फुटबाल, क्रिकेट, कुश्ती व पतंगबाजी
के बेहद शौकीन मन्ना ने संगीत से शास्त्रीयता व मिठास को गायब होता देख २००१ में मंबई
छोड़ दिया। छोटी बेटी सुमिता के घर बंगलुरु आ गए। उन्होंने साठ से ज्यादा साल तक गायन
को अपनी आत्मा दी थी।
बांग्ला में प्रकाशित ‘जीबोनेर जलसा घरे’ उनकी आत्मकथा है
जो हिंदी में ‘यादें जी उठीं’के नाम से प्रकाशित
हुई। पद्मश्री, पद्मविभूषण, दादा साहब फालके, फ़िल्मफे़यर लाईफ़टाईम
आदि अनेक अवार्ड उन्हें मिले। मगर हर बार यही दिखा कि अवार्ड उनकी बहुआयामी प्रतिभा
व व्यक्तित्व के समक्ष हमेशा बौने रहे। उन्होंने अनुमानतः ४००० गाने गाये।
मन्ना डे का जन्म ०१ मई
१९१९ को कलकत्ता में हुआ था और २४ अक्टूबर २०१३ को बंगलुरु दिवंगत हुए। वो ९४ साल के
थे। इसके साथ ही अमर आवाज़ों की दुनिया का ये जादूगर दुनिया के समक्ष ये पहेली छोड़ गया-
ज़िंदगी कैसी है पहेली...।
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Published in Navodaya Times dated 26 Oct 2016
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वाह
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